एनडीडीबी द्वारा एनसीडीएफआई एवं इरमा के सहयोग से व्‍यावसायिक उद्यम के रूप में डेरी सहकारिताओं में प्रतिस्‍पर्धी बढ़त हासिल करने के लिए सहकारी सम्‍मेलन का आयोजन

एनडीडीबी द्वारा एनसीडीएफआई एवं इरमा के सहयोग से व्‍यावसायिक उद्यम के रूप में डेरी सहकारिताओं में प्रतिस्‍पर्धी बढ़त हासिल करने के लिए सहकारी सम्‍मेलन का आयोजन 

 

आणंद, 12 मार्च 2019: राष्‍ट्रीय डेरी विकास बोर्ड द्वारा नेशनल कोऑपरेटिव डेरी फैडरेशन ऑफ इंडिया लि. तथा इरमा, आणंद में स्थित इंस्‍टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट आणंद के सहयोग से 12-13 मार्च 2019 के दौरान आयोजित ‘’व्‍यावसायिक उद्यम के रूप में डेरी सहकारिताओं में प्रतिस्‍पर्धी बढ़त हासिल करने के लिए सहकारी सम्‍मेलन’’ में मुख्‍य अतिथि के रूप में डॉ. राजीव कुमार, उपाध्‍यक्ष, नीति आयोग उपस्थित थे । श्री दिलीप रथ, अध्‍यक्ष, एनडीडीबी; श्री सतीश मराठे, आरबीआई केंद्रीय बोर्ड के सदस्‍य; श्री मंगल जीत राय, अध्‍यक्ष, एनसीडीएफआई; प्रो. हितेश भट्ट, निदेशक, इरमा; श्री आर एस सोढ़ी, प्रबंध निदेशक, जीसीएमएमएफ लि.; प्रो. तुषार शाह; प्रो. संजीव फंसालकर; डॉ. एन वी बेलावाड़ी तथा श्री संपथ कुमार ने इस समारोह की शोभा बढ़ाई ।

भारत में डेरी सहकारिताओं की यह उल्‍लेखनीय प्रगति उनके संचालन, व्‍यावसायिक वृत्ति एवं सहभागी सदस्‍यों से संबद्ध विभिन्न समस्‍याओं एवं अवरोधों की साझेदारी किए बिना संभव नहीं हुई है। प्रतिष्ठित सहकारी लीडर, कार्मिक, शिक्षाविद, नीति निर्माता तथा डेरी सहकारी क्षेत्र के अन्‍य हितधारकों ने इन विषयों पर विचार-विमर्श किया ।

अपने अभिभाषण में डॉ. राजीव कुमार, उपाध्‍यक्ष, नीति आयोग ने कहा कि 1947 में अमूल मॉडल के आरंभ होने के बाद से आर्थिक वास्‍तविकता में बदलाव आया है । इन परिवर्तनशील परिस्थितियों में सहकारिता आंदोलन के संबंध में विश्‍लेषण की महती आवश्‍यकता है । डॉ. कुमार के अनुसार, व्‍यावसायिक वृत्ति के साथ, इस राष्‍ट्रीय कर्तव्य के लिए मानव प्रतिबद्धता पर विशेष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है । सहकारिताओं को जवाबदेह होना होगा तथा व्‍यावसायिक उद्यम के रूप में सहकारिताओं में इस प्रतिस्‍पर्धी बढ़त को हासिल करने के लिए अलग-थलग पड़े किसानों को एक जुट होना होगा । डेरी सहकारिताओं को अत्‍याधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ ही मजबूत शासन व्यवस्था, श्रेष्‍ठ व्‍यावसायिक मॉडल और पारदर्शी संचालन प्रणाली हेतु अंतर्निहित प्रणाली से सुसज्जित होने की आवश्‍यकता है। 

डॉ. कुमार ने यह कहा कि हम यह जानते हैं कि देश के कई भागों में हमारी डेरी सहकारिताएं अप्रभावी हैं, जिसके कारण वे छोटे दूध उत्‍पादकों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ हैं । परंतु यदि अपेक्षित सुधार किया जाए और इन संस्‍थाओं का पुनरूत्‍थान किया जाए, तो उनका        कायाकल्प संभव है । अपने सदस्‍य उत्‍पादकों के हितों की रक्षा करने के लिए सहकारिताओं को निजी क्षेत्र में मौजूद प्रतिस्‍पर्धियों की ही तरह कार्यकुशल होने की आवश्‍यकता है । उन्‍होंने यह आशा व्‍यक्‍त की कि इस सम्‍मेलन से इस सहकारी आंदोलन के पुनरूत्‍थान का मार्ग प्रशस्त होगा।

श्री दिलीप रथ, अध्‍यक्ष, एनडीडीबी ने यह बताया कि भारत में 1,87,000 से अधिक ग्राम डेरी सहकारिताओं का व्‍यापक नेटवर्क मौजूद है । दुर्भाग्‍य से, पूरे देश में डेरी सहकारिता में एक समान सफलता प्राप्‍त नहीं हो सकी है । प्रमुख डेरी राज्‍यों में से झारखंड में ग्रामीण कवरेज का प्रतिशत न्यूनतम 13% है, जबकि यह गुजरात में 100% के नजदीक है । संपूर्ण भारतीय स्तर पर, डेरी सहकारिताओं की पहुंच डेरी संभावित गांवों में 60% तक ही सीमित है । अब, इस वर्ष के अंत का यही उचित समय है, जब एनडीडीबी की अगुवाई में राष्‍ट्रीय डेरी योजना चरण-। के अगले क्रम में दूध क्षेत्र के विकास के लिए अन्य बड़ा अभियान चलाए जाए।

अध्‍यक्ष, एनडीडीबी ने कहा कि वैधानिक एवं विनियामक सुधारों, नीतिगत सहयोग के जरिए शेष  गांवों को शामिल करने लक्ष्‍य को पूरा करके तथा उन्‍हें पूर्ण कार्यात्‍मक स्‍वायत्‍ता प्रदान करके स्‍थानीय स्‍तर की सहकारिताओं को सुदृढ़ बनाने की आवश्‍यकता है । ग्राम स्‍तर पर बुनियादी ढांचे का निर्माण, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण के साथ ही उत्‍पादक वृद्धि सेवाओं की उपलब्धता का प्रावधान करके इस गतिविधि में सहायता उपलब्‍ध कराने के लिए वित्‍त-पोषण कार्यक्रम संचालित करने की आवश्‍यकता  है – जो मुख्‍यत: विश्‍व बैंक से वित्‍त पोषित हो – एनडीपी-। के अगले चरण के रूप में हो । जहां सहकारी गतिविधियां संभव नहीं है, उन क्षेत्रों में हमें उत्‍पादक कंपनियों को प्रोत्‍साहित करने की आवश्‍यकता है । सभी भावी गतिविधियों में, सहकारिताओं में बाजार की पहुंच उपलब्ध कराने एवं कवरेज विस्‍तार के लिए दूध उत्‍पादक परिवारों में केवल महिला सदस्‍यों को शामिल करने तथा उनका पूर्ण वित्‍तीय समावेश करने की आवश्‍यकता है, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों का चौतरफा सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव होगा । 

इस सम्‍मेलन के प्रतिभागियों ने डेरी उद्योग के महत्व और आजीविका प्रदान करने में इसकी भूमिका तथा ग्रामीण भारत में समावेशी विकास को प्रोत्‍साहित करने के महत्‍व पर विचार-विमर्श किया। सहकारिताओं को पसंदीदा उद्यम के रूप में चुने जाने के मूल कारण को रेखांकित किया गया है और सहकारी डेरी उद्योग के विकास एवं उपलब्धियों पर विचार-विमर्श किया गया । डेरी सहकारिताओं के विकास में कार्यक्षमता के अवरोधक विभिन्‍न पक्षों को उदघाटित किया गया। सभी प्रतिभागियों का यह दृढ़ विश्‍वास है कि स्‍थायी एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए सभी डेरी सहकारिताएं अन्य सभी संस्‍थागत रूप की तुलना में सर्वथा सक्षम हैं ।

डॉ. कुमार ने मुजकुवा गांव, आणंद का दौरा भी किया और एनडीडीबी द्वारा संचालित विकास संबंधी पहलों की सराहना की जिनमें सोलर पम्‍प इरीगेटर कोऑपरेटिव इंटरप्राइज (स्‍पाइस), आहार संतुलन कार्यक्रम, चारा विकास कार्यक्रम एवं बायोगैस संयंत्र शामिल हैं ।